बबली बाउंसर का गाना मैड बांके आउट: तमन्ना भाटिया की जबरदास्ता ठुमके, देखें

बबली बाउंसर का गाना मैड बांके आउट: तमन्ना भाटिया की जबरदास्ता ठुमके, देखें

Madhur Bhandarkar Film: निर्देशक को हर तरह की फिल्म बनानी चाहिए, लेकिन फिल्म में उसका सिगनेचर दिखना जरूरी है. बबली बाउंसर मधुर भंडारकर की फिल्म है, देख कर भी यह विश्वास नहीं होता. ऐसी फिल्म मधुर के अलावा कोई और भी बना सकता है.

Tamanna Bhatia Film: चांदनी बार (2001) के साथ मधुर भंडारकर ऐसे निर्देशक के रूप में उभरे थे, जिसका अपने समय की नब्ज पर हाथ है. वह यथार्थ को कड़ाई से बयान करते है. उनकी पेज 3, कॉरपोरेट, ट्रेफिक सिग्नल और फैशन में भी यह दिखा. लेकिन फिर धीरे-धीरे उनकी साफगोई कम होती गई और अंतत वह पीरियड फिल्म से रोमांटिक कॉमेडी तक आ गए हैं. हालांकि ग्यारह साल पहले उन्होंने दिल तो बच्चा है जी जैसी रोमांटिक कॉमेडी बनाई थी, मगर समय और यथार्थ की नब्ज अब उनकी फिल्मों में नहीं दिखती. वह ऐसी फिल्म लिख और बना रहे हैं, जिसे कोई भी लेखक-निर्देशक बना सकता है. वह ऐसी फिल्म नहीं बना रहे, जिसे सिर्फ मधुर भंडारकर बना सकता है. आप बबली बाउंसर में मधुर भंडारकर को तलाश करेंगे तो निराश होंगे. अगर सिर्फ गोरी-चिट्टी तमन्ना भाटिया को हर सीन में कॉमेडी करने की कोशिश करते देखकर खुश होंगे, तो पूरी फिल्म देख पाएंगे.

बबली और उसके आइडिये
डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज हुई बबली बाउंसर की कहानी में हरियाणा का ऐसा गांव हैं, जो अपने लड़कों के बाउंसर बनने के लिए प्रसिद्ध है. गांव के अखाड़े में पहलवान बनाने वाले गजानन (सौरभ शुक्ला) की बेटी बबली भी एक दिन दिल्ली के किसी बार-रेस्तरां में बाउंसर बन जाती है. बबली पहलवानी करती है, वजन उठाती है. लेकिन निर्देशक ने यह बात फिल्म में कहीं दिखाई नहीं. उसे सिर्फ खाते और डकार लेते दिखाया है. यूं तो बबली के मां-बाप उसकी शादी करना चाहते हैं, लेकिन वह लड़कों को नए-नए आइडिये लगाकर भगा देती है. गजानन के अखाड़े का पहलवान-बाउंसर कुक्कू (साहिल वैद) बबली से प्यार करता है मगल बबली को अपनी स्कूल टीचर के लंदन-रिटर्न लड़के से प्यार हो जाता है. जबकि वह खुद दसवीं पास नहीं है. इस प्यार का अंजाम क्या होगाॽ क्या कुक्कू का वन-साइड लव रंग लाएगाॽ क्या बबली के मां-बाप की इच्छा पूरी होगीॽ या बबली कुछ और ही कर गुजरेगीॽ

क्या याद रखेंगे आप
मधुर ने नब्बे के दशक वाले अंदाज में कहानी लिखी है. वह हीरोइनों को केंद्र में रख कर महिलाओं के ज्वलंत मुद्दों पर फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं. मगर इस फिल्म में सिर्फ हीरोइन रह गई. बाकी सब गायब है. कहानी को बढ़ाने के लिए मधुर ने अंकलजी (सब्यसाची चक्रवर्ती), बार-रेस्तरां के मैनेजर जग्गी सरदार (सानंद वर्मा) और बॉबी दीदी (अश्विनी कलसेकर) जैसे किरदारों के ट्रेक गढ़ने पड़ रहे हैं, जिन्हें हटा दें तो फिल्म पर रत्ती भर फर्क न पड़े. बबली बाउंसर की कहानी में दम नहीं है. एक लड़की के बाउंसर बनने के आइडिये को फिल्मी फार्मूलों पर गढ़ा गया है. अतः जब-जब कहानी इशारा करती है कि कुछ नया होने वाला है, आप समझ जाते हैं कि वह क्या बात होगी. मधुर का निर्देशन औसत है. कुछ जगहों पर सीन भी ऐसे शूट किए गए, जहां कैमरा एंगल सहज नहीं लगता. दो दृश्यों के बीच के ट्रांजीशन में गांव की एक ही जैसी ‘सीनरी’ का इस्तेमाल कल्पनाशीलता के अभाव को बताता है. कहानी में गांव-बार-रेस्तरां और प्यार के बावजूद गीत-संगीत में कुछ ऐसा नहीं, जिसे आप याद रख सकें.


अगर आप हैं मधुर के फॉलोअर
अभिनय के लिहाज से जरूर तमन्ना भाटिया का परिश्रम नजर आता है, लेकिन उन्हें लंबी पारी के लिए अपने समय की कहानियां चुननी चाहिए. न कि फार्मूलों वाली. साहिल वैद प्रभावित करते हैं. वह सहजता से किरदार में उतरे हैं. जबकि लंदन रिटर्न विराज कौशिक बने अभिषेक बजाज कुछ दृश्यों में असहज दिखते हैं. सौरभ शुक्ला शानदार हैं और उनकी पत्नी गंगा के रूप में सुप्रिया शुक्ला भी. अगर आप मुधर भंडारकर के काम को फॉलो करते रहे हैं, तो सिर्फ इस जिज्ञासा के साथ यह फिल्म देखी जा सकती है कि उन्होंने नया क्या किया. एक और वजह यह भी हो सकती है कि आप ज्यादा कुछ सोचे बगैर सीधी-सादी रोमांटिक कॉमेडी पसंद करते हों.

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